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Saturday, 15 September 2018

कमज़ोर की मदद करना चाहिए वो किसी भी धर्म का हो दाख्खिन पट्टी रन्नो के इमामबाड़े से बोले एस एम मासूम

 https://www.youtube.com/payameamn
  कमज़ोर की मदद करना चाहिए वो किसी भी धर्म का हो दाख्खिन पट्टी रन्नो के इमामबाड़े से बोले एस एम मासूम

जौनपुर :मुहर्रम के महीने में शोकसभाएं पैगम्बर ऐ इस्लाम हज़रत मुहम्मद ने नवासे और मुसलमानो के खलीफा हज़रत अली के बेटे इमाम हुसैन की शहादत को याद करके मनाई जाती है | इस बार इस एम् मासूम अपने वतन जौनपुर में हैं और अलग अलग इमामबाड़ों से इमाम हुसैन का अमन का भाईचारे का पैगाम दुनिया तक पहुंचा रहे हैं | कभी बड़े इमाम गूलर घाट तो अभी कारंजा खुर्द तो कभी रन्नो |

मुहर्रम की तीसरी को दाख्खिन पट्टी रन्नो के इमामबाड़े  में शोक सभा (मजलिस ) हुयी जिसमे आस पास के साथ गांव के लोग थे | इस मजलिस  को ज़ाकिर ऐ अहलेबैत इतिहासकार और सोशल मीडिया के जानकार एस एम् मासूम ने खिताब किया और लोगों को बताया की दुनिया का हर इंसान जो कमज़ोर है चाहे किसी भी धर्म का हो इस्लाम कहता उस पे रहम करो उसकी मदद करो | जिस हुसैन ने प्यास की हालत में दुश्मन के साथ साथ उसके जानवरों को भी पानी पिलाया उसी हुसैन को कर्बला में तीन दिन का प्यासा शहीद किया गया |


मजलिस के बाद इमाम हुसैन के भाई हज़रात अब्बास का अलम और तुर्बत निकली और अंजुमनों ने नौहा मातम किया साथ में तबल की आवाज़ से हुसैनी पैगाम की विजय का ऐलान हुआ |
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Saturday, 23 September 2017

जौनपुर इमामबाड़ा बड़े इमाम से मुहर्रम की शोक सभाएं शुरू |

इस्लाम अमन और शांति का पैगाम देता है | 


जब मुहर्रम आता है हुसैन को चाहने वाले अलम ताजिया लिए नौहा मातम करते पूरी दुनिया में दिखने लगते हैं | यह अपने अपमे एक चमत्कार है की कर्बला का वाकेया जहां पैगम्बर ऐ इस्लाम हजरत मुहम्मद के नवासे इमाम हुसैन को ज़ालिम यजीद की फ़ौज ने शहीद किया इसे आज १380 हो चुके है फिर भी इमाम हुसैन  के चाहने वाले इसे ऐसे मनाते है जैसे यह अभी कल की ही बात हो |

इमाम हुसैन (अ.स) का ग़म जौनपुर में बड़े जोश से मनाया जाता है जिसमे हिन्दू मुसलमान शिया सुन्नी सभी शामिल हुआ करते हैं | शिया मुसलमान अपने घरों में अपने इमामबाड़ों में चाँद रात को ही ताजिया आलम सजा देते हैं और दस दिनों तक मजलिसें (शोक सभाएं ) किया करते हैं |

इस वर्ष हर साल की तरह गूलर घाट स्थित इमामबाड़ा बड़े इमाम में जनाब जीशान जैदी साहब ने शोक सभाएं (मजलिस ) आयोजित किया जिसमे जौनपुर के मशहूर इतिहासकार ,ब्लॉगर और इस्लाम के जानकार एस एम् मासूम अपने विचार पेश कर रहे हैं | आज पहली मुहर्रम को जनाब एस एम् मासूम साहब ने बताया हम शोक सभाएं इसलिए मनाते हैं की दुनिया को हम बता सकें की इस्लाम में ज़ुल्म करने वाला यजीद कहलाता है जो चाहे खुद को खलीफा कहे लेकिन मुसलमान उसे नहीं मानते बल्कि कह लें की धिक्कारते हैं |


इस्लाम अमन और शांति का पैगाम देता है और इसमें हथियार केवल अपनी हिफाज़त के लिए उठाया जा सकता है आगे बढ़ के किसी पे हमला नहीं किया जा सकता | इसी लिए हमारे इमामबाड़ों में हर कौम हर धर्म के लोगों को बुलाया जाता है और उन्हें भाईचारे का पैगाम दिया जाता है | इस्लाम एक ऐसा धर्म है जिसमे पडोसी चाहे वो किसी भी धर्म का हो भूखा हो तो उसे खिलाय बिना खुद नहीं खा सकता मुसलमान |


मुसलमानों ने पहली मुहर्रम को जो ताजिया सजाया था  उसे तो 10 मुहर्रम जिसे आशूरा भी कहते हैं ,के दिन दफन कर दिया जाता है लेकिन दो महीने आठ दिन तक यह इमाम हुसैन का दुःख मनाया जाता है  | इन दिनों में मुसलमान काले कपडे पहने दुनिया के  हर देश की तरह जौनपुर में भी नज़र आयेगे| जगह जहग शब्बेदारी, जुलुस अज़ादारी ,मजलिस का सिलसिला इन दो महीने आठ दिन तक चलता रहता है जिसमे बहुत से ख़ास दिन जैसे आशूरा, इमाम का दसवां, चौबीसवां,चालीसवां,28 सफ़र इत्यादि ख़ास होते हैं |

एस एम् मासूम इस इमामबाड़े से अमन का ,भाईचारे का ,इंसानियत का पैगाम पूरे सप्ताह हर दिन देंगे और ज़ालिम यजीद ने जो ज़ुल्म इस्लाम के पैगम्बर हजरत मुहम्मद पे किये उसे दुनिया तक पहुंचाएंगे जिस से समाज में अमन और शांति कायम रहे |

धर्म दर्शन

 
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